आम आदमी पार्टी (आप) के 10 में से सात राज्यसभा सदस्यों ने 24 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अपने विलय का एलान किया। राज्यसभा के सभापति ने विलय के उनके दावे को स्वीकार कर लिया है, जिससे ऊपरी सदन में भाजपा का संख्या बल बढ़कर 113 हो गया है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का संयुक्त संख्या बल पहली बार आधे के पार चला गया है। यह प्रकरण ‘आप’ की फितरत, दल-बदलुओं की घोर मौकापरस्ती, भाजपा के कुचक्रों, और दलबदल-विरोधी कानून को संस्थाबद्ध तरीके से नख-दंतविहीन किये जाने को उजागर करता है। इन सात में से, राघव चड्ढा, संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल स्वाभाविक तरीके से ‘आप’ का हिस्सा थे। सीमित हद तक ही सही, इनसे पार्टी की पहचान इसके संस्थापक अरविंद केजरीवाल की अपनी मनमर्जी से परे भी थी। बाकी के चार की बात करें तो उनका जाना भी उतना ही अवसरवादी है जितना उनका ‘आप’ में आना था। केजरीवाल कई राज्यों में अपने विधायक भाजपा के हाथों गंवाने के लिए कांग्रेस पर तंज कसा करते थे, इसे उसकी नैतिक जिम्मेदारी के क्षरण के लक्षण की तरह पेश करते थे। लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए अराजकता का अथक अभियान ‘आप’ का असली चरित्र सामने ले आया जो उसके बड़े-बड़े दावों से बहुत अलग था। राज्यसभा की उसकी टोली का टूटना उस विश्वासहीनता (सिनिसिज्म) और अवसरवाद का चरम है जिस पर ‘आप’ फली-फूली, और जिसके चलते भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को भारी कीमत चुकानी पड़ी। उसने जो बोया, वही काटा।

इसका यह मतलब कतई नहीं है कि संविधान की दसवीं अनुसूची – जो निर्वाचित प्रतिनिधियों का अपनी मूल पार्टी से दल-बदल रोकती है – की उस निर्लज्ज गलत-व्याख्या को अनदेखा कर दिया जाए जिसका इस्तेमाल सात के गिरोह ने किया और जिसे राज्यसभा के सभापति ने स्वीकार कर लिया। इस अनुसूची में शामिल विलय के अपवाद में यह साफ है कि कोई पार्टी दूसरे के साथ विलय कर सकती है, बशर्ते कि उसके दो-तिहाई विधायी सदस्य इसके लिए तैयार हों। साल 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधायी दल राजनीतिक दल की दिशा तय नहीं कर सकता और इन दोनों को एक ही नहीं माना जा सकता। दलबदल-विरोधी कानून के तहत किसी विलय के वैध होने के लिए यह जरूरी है कि मूल पार्टी के विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य इसे स्वीकार करें। इसे सिर के बल खड़ा कर देना और यह दलील देना कि किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायी सदस्य अयोग्यता के खतरे के बिना दूसरी पार्टी में जा सकते हैं एक मनमाना फैलाव है और इसे ‘आप’ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है। अफसोस की बात है कि इसी तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के पिछले हस्तक्षेप आश्वस्तकारी नहीं हैं। थोड़ा अतीत में जाएं तो बड़े-पैमाने के दल-बदल के बूते निर्वाचित सरकारें सत्ता से बेदखल हुई हैं, जिसने दसवीं अनुसूची को नाकारा बना दिया है। लोकप्रिय जनादेश के साथ इस खुले विश्वासघात के लिए सुप्रीम कोर्ट कोई भयावरोध स्थापित नहीं कर सका, जो इससे साबित होता है कि इस तरह के कृत्य बिना किसी दंड के दोहराये जा रहे हैं।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *